22 अप्रैल 2017

ये भी भारत

बेरोजगार युवको के यहाँ वहा भटकते कृशकाय ढांचे, जिनके चेहरों पर वर्षों की हताशा और निराशा ने समय पूर्व ही  झुर्रियां डाल रखी है, सड़क किनारे बिखरा कूड़ा और उसमें भोजन का जुगाड़ करते कुछ अत्यंत मैले कपड़ो में भूख से परेसान लोग और पोलीथिन सहित कुछ जूठन खाने को आतुर आवांरा पशु – ये भी हमारी भारत माँ की एक तस्वीर है,
मंदिर के पास कूड़े का ढेर, गन्दगी में बसे हुयी बस्तियाँ और उसमे रहने वालें हजारो लोगो की पानी के लिए लगती लम्बी कतारे, और कतार दृष्टी से देखते उनके स्कूल न जाने वाले बच्चे, इस भीषण गर्मी में एयर कंडीशन कार में बैठे लोगों से भीख मांगती वो औरत जिसे बिलकुल परवाह नही की उसके बच्चे को कितनी धूप लग रही है- क्या भारत माँ का एसा दृश्य आपके सामने से नही गुजरा,
किसानों का पर्यायवाची बन चुका गरीबी आत्महत्या, देश के पोर पोर को चबाता कर्मचारियों का भ्रष्ट आचरण, गन्दी राजनीती चमकाने के लिए सरकार की सही नीतियों का भी विरोध करने वाले नेता, दामन को साफ़ रखने के चक्कर में सिपाहियों की भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज का दमन करते अधिकारी, - क्या आपने कभी नही महसूस किया भारत माँ का यह दर्द

देश की सम्पति लूटने वाले नेता और सजा पाए बाहुबली को सिर्फ टी.आर.पी. के लिए महिमा मंडित करता न्यूज़, और ऐसे देशद्रोही सजायाफ्ता लोगों के पीछे तलवे चाटते समर्थक, कमजोरों के लिए भावना खोते जा रहे लोग –क्या यही हमारे सपनो का भारत है?.. 

27 मार्च 2017

हमारी जीवनदायनी


 हमारी जीवनदायनी

 जिस तरह आज 21 वी सदी के पूर्वाध में कुछ प्रबुद्ध भारतीय 3 तलाक का विरोध कर रहे है, उसी तरह 19 वीं सदी के पूर्वार्ध में राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया था ,समाज में व्याप्त कुरीतियाँ ; अमानवीय सोच की पराकाष्ठा है /
ये सामजिक कुरीतियाँ किसी एक विशेष संप्रदाय में ही नही वरन ये व्यापक रूप से हमारे आपके अन्दर पैठ बना चुकी है,
हम सब को अहसास ही नहीं होता की हमारी मानसिकता किसी दुसरे व्यक्ति के लिए कैसी निकृष्ट होती जा रही है, अहसास हो भी तो कैसे जबकि हमें ये बताया ही नहीं गया हो की मर्यादित स्थिति क्या है ; अहसास तो तब होता है जब खुद पर गुजरती है, हमारे खुद के समाज में इसे तमाम उदहारण पटे पड़े है आप एक बार आँखे खोल के देखिये समझ आ जायेगा, हम दिन बा दिन अमानवीयता के नए नये परचम लहरा रहे है, किसी को फुर्सत नही होती की एक एक्सिडेंटल आदमी को हॉस्पिटल पहुच दे/
तो ये बता रहा था की  ये सामजिक कुरीतियाँ किसी एक विशेष संप्रदाय में ही नही वरन ये व्यापक रूप से हमारे आपके अन्दर बैठी हुई है, हमको हमेशा ही किसी ऐसे व्यक्ति की जरुरत होती है जो हमको इन कुरीतियों के बारे में बता सके , जिस तरह आज कुछ मंद अक्ल लोग तीन तलाक के समर्थन में है उसी तरह कमोबेश 200 साल पहले भी कुछ मंद अक्ल धार्मिक ठेकेदारों ने सती प्रथा को ख़तम करने का विरोध किया था, 2शताब्दी पहले यह सुधार बैंटिक के हाथो में था आज यह सुधार मुख्यतः माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हाथों में है/
प्रगति के सिद्धांतो के अनुसार ‘सभी समाज को समय के अनुसार अवश्य बदलना होता है, कोई भी समाज न जड़ था; न जड़ हो सकता है’  किसी भी स्थिति में आदमी को तब पवित्र ग्रंथों शास्त्रों और विरासत में मिली परम्पराओं से हट जाने में नहीं हिचकिचाना चाहिए जब मानवीय तर्क शक्ति का वैसा तकाजा हो और वो परम्परायें समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही हों,
नए और पुराने दृष्टिकोण में टकराव होना कोई नयी बात नहीं है , और टकराव होना भी चाहिए क्योकि समाज को तो वही चाहिए जो समाज के हित में हो लेकिन वो टकराव केवल मतभेद के रूप में होने चाहिए, खुले मन और संकुचित विचारधारा का टकराव होगा तो परिणाम या तो नगण्य होगा या तो विध्वंशक और हमे दोनों ही नहीं चाहिए, हमे जरुरत नहीं है न्यूज़ चैनल पर आके चिल्लाने वालो की हमें राज्यसभा टीवी के जैसे बौद्धिक डिबेट करने वालों की जरुरत है,
इतिहास में जब भी कभी समाज में मानवता को नष्ट करने वाली कुरीतियों के निदान की शुरुवात हुई है इन्ही कुरीतियों को बचने वाले भी खड़े हुए है जिसकी वजह शायद यह है की इन्हें महसूस ही नहीं होता की ये बुराईयाँ है, उदहारण के तौर पर कोई बाहरी व्यक्ति ही आपको बता सकता है की आपके घर के पास के नाले में अजीब दुर्गन्ध है वो दुर्गन्ध आपको इसलिए महसूस नहीं हो रही क्युकी आपका दिमाग उस दुर्गन्ध को आत्मसात कर चुका है/ सामाजिक बुराई हटने के बाद विरोधी भी महसूस करते है की हमने किस रोग को पाला हुआ था/
आज अगर नयी पीढ़ी की किसी व्यक्ति को सती प्रथा के बारे में बताओ तो निश्चय ही वो आश्चर्य व्यक्त करेगा,
और जहा तक पवित्र ग्रंथो की बात है न तो किसी स्त्री को जबरन सती करने का प्रावधान कही पर था और न ही तीन तलाक का ऐसा मौजूदा स्वरुप ,

बात यहाँ पर किसी धर्म विशेष की नहीं; एक जीती जागती औरत की है  जो किसी धर्म में होने के पहले एक जिन्दा मनुष्य है ,एक जीवनदायनी है उसे न तो जबरन जिन्दा जला देना सही था और न ही एकतरफा तलाक़ दे कर 3 महीने में उसे बेसहारा छोड़ देना सही है,

16 जनवरी 2017

ठंडे बस्ते में जांच कमेटियां

कानपुर रेल हादसे ने एक बार फिर सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है। लोग मरते रहें, हादसे होते रहें, इससे सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार को पता है कि ऐसे हादसों के बाद एक जांच कमेटी गठित करनी है। जिसकी रिपोर्ट भी उनके ही पाले में रहेगी। येही होता है रेलवे सुरक्षा के नाम पर बनाई गई हर कमेटी का अंजाम।

साल 2011 में रेलवे सुरक्षा उपायों पर तत्कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने डॉ. अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई थी। वर्ष 2013 में कमेटी की सौंपी गयी रिपोर्ट में रेलवे सेफ्टी अथॉरिटी का गठन, रेलवे रिसर्च एंड डेवलपमेंट काउंसिल बनाने का सुझाव दिया गया था। इसके अलावा स्टेशन मास्टर, असिस्टेंट स्टेशन मास्टर, असिस्टेंट लोको पायलट, गैंगमैन, कीमैन, प्वाइंटस मैन जैसे सुरक्षा स्टॉफ की कमी दूर करने समेत 106 अहम सुझाव दिए थे।
काकोदकर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ट्रैक और रोलिंग स्टॉक का रखरखाव बढ़ाने, कलपुजरे की कमी दूर करने और प्रशासनिक ढांचे में सुधार के लिये 5 सालों में 1.40 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत बताई थी। काकोदकर कमेटी से पहले भी कई कमेटियां बनी हैं। लेकिन उनके सुझावों पर भी अमल नहीं हुआ। 1962 में गठित कुंजरू कमेटी, 1968 में बांचू समिति, 1978 में सीकरी समिति, 1998 में खन्ना समिति ने भी रेल में सुधार और यात्रियों की सुरक्षा के ठोस उपाए सुझाए थे।
सभी कमेटियों ने दुर्घटना की मुख्य वजह शॉर्ट सर्किट, असुरक्षित क्रॉसिंग, ट्रेन का पटरी से उतरना, रेलवे स्टाफ की कमी, सामान में खामियां, टक्कर को माना था लेकिन तमाम सुझाव ठंडे बस्ते में डाल दिए गए।
अब कानपुर रेल हादसे के बाद सवाल फिर से वही खड़ा हो रहा है कि आखिर इन कमेटियों का क्या फायदा। क्यों बनाई जाती हैं इस तरह की कमेटियां? एक सवाल और कि आखिर सरकारें इन हादसों से कब सबक लेंगी?

आइए जानते हैं कि हैकिंग के भूत से कैसे बचें?

इस तकनीकी लेख का यह टाइटल मैंने इसलिए दिया है, क्योंकि अक्सर पाकिस्तानी या चीनी हैकर भारतीय वेबसाइटों को हैक कर उस पर भूत और चुड़ैल की तस्वीर बना देते हैं और लिख देते हैं पाकिस्तान जिंदाबाद या फिर भारत के बारे में गलत बातें! कई बार तो सरकारी वेबसाइटें भी हैक की गई हैं और इसलिए वक्त बेवक्त यह मामला उछलता ही रहता है। हाल-फिलहाल हैकिंग का मामला इसलिए ज्यादा चर्चित हुआ है क्योंकि कांग्रेस के ऑफिसियल ट्विटर अकाउंट के साथ-साथ पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी का ट्विटर अकाउंट भी हैक हो गया था। इसके कुछ ही दिनों बाद यह खबर देखी कि भारत के भगोड़े व्यापारी विजय माल्या का ट्विटर अकाउंट भी हैक कर लिया गया है। जाहिर तौर पर एक-एक करके मामला गंभीर होता जा रहा था और इस कारण अतिरिक्त सावधानी बरतने पर हम सभी को अवश्य ही विचार करना चाहिए।
अगर शुरुआती स्तर पर देखा जाए तो हैकिंग की अधिकांश घटनाएं हमारी स्वयं की गलतियों का ही परिणाम होती हैं, खासकर फेसबुक, ट्विटर या कोई अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जिसमें आपका अकाउंट है, वह यदि हैक होता है तो आप मान कर चलें कि 99.99 फ़ीसदी उम्मीद यही रहती है कि इसमें आपकी गलती हो, क्योंकि फेसबुक या ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म अतिरिक्त रूप से सुरक्षित होते हैं। हाँ, यदि कहीं पब्लिक कंप्यूटर पर लॉगिन करते समय अगर आपका पासवर्ड कोई स्टोर कर ले, या फिर आप द्वारा लिखे गए पासवर्ड को कोई चुरा ले, किसी आसान पासवर्ड को हैकर्स गेस कर लें, तो फिर मामला दूसरा हो जाता है।
पासवर्ड लीक होने का जो सबसे बड़ा खतरा होता है, वह फिशिंग के कारण उत्पन्न होता है। मतलब, आपके ईमेल पर एक लिंक आता है, जिसे क्लिक करने पर हूबहू ट्विटर, फेसबुक या जीमेल का लॉगिन पेज खुल जाता है। आप भ्रमित होकर वहां अपना यूजर आईडी और पासवर्ड डालते हैं और फिर वह डिटेल हैकर्स के पास आसानी से पहुँच जाती है। इससे बचने के सामान्य उपायों में यही है कि आप किसी भी यूआरएल को टाइप कर के खोलें, न कि किसी अनजान द्वारा भेजे गए लिंक पर क्लिक करके! खासकर, वैसी वेबसाइट तो बिलकुल भी लिंक पर क्लिक करके न खोलें, जिसमें यूजरनेम या पासवर्ड डालना हो! इसके अतिरिक्त, यूआरएल में http की बजाय https का होना आपकी जानकारी को और भी सिक्योर बनाता है।
सामान्य रूप से फेसबुक, ट्विटर, जीमेल या दूसरे बड़े प्लेटफॉर्म https यानी सिक्योर सर्वर का प्रयोग ही करते हैं। बात जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से अलग हटकर पर्सनल वेबसाइटों की करते हैं तो यहाँ, सर्वर, वायरस और प्रोग्रामिंग जैसे फैक्टर भी कार्य करते हैं और यहाँ आपको अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। यह मुमकिन है कि आप कोई अनसेफ वेबसाइट खोलें और आपके कम्प्यूटर में मालवेयर डाऊनलोड हो जाए और आपके तमाम डेटा को करप्ट कर दे अथवा आपकी गैर जानकारी में आपकी इनफार्मेशन अनजान लोकेशन्स पर भेज दे! इसके लिए रेपुटेड कंपनियों का एंटीवायरस इस्तेमाल अवश्य करें, तो समय-समय पर अपने पीसी को स्कैन भी करते रहें। और भी सुरक्षित रहना चाहें तो उन वेबसाइट पर दोबारा विजिट ही न करें, जिन्हें खोलने भर से या उस पर कहीं भी क्लिक करने से ढेर सारे पॉप-अप विंडोज खुल जाते हों! अगर कोई वेबसाइट आपके बन्द करने के बावजूद ब्राउजऱ में बन्द नहीं हो रही है, तो तत्काल अपने पीसी को पावर बटन दबाकर शट डाउन करें (डायरेक्ट शट डाउन उचित रहता है, न कि मैन्युअल, ताकि कोई मैलवेयर स्टोर होने से पहले आपका कंप्यूटर उसे रिजेक्ट कर दे।) हालाँकि, कई मामलों में यह ट्रिक कामयाब नहीं होती है, किन्तु मैंने कई मामलों में इस ट्रिक को कारगर पाया है।
कांग्रेस ने अपने अकाउंट हैक होने के बाद सीधे-सीधे दक्षिणपंथी समर्थकों या भाजपा समर्थकों पर आरोप लगा दिया कि यह उनकी ही कारगुजारी है, किंतु बात अगर भाजपा की ऑफिशियल वेबसाइट बीजेपी डॉट ओआरजी की करते हैं, तो खुद उस पर प्रतिदिन सैकड़ों साइबर हमले होते हैं। मतलब साफ़ है कि कोई भी साइबर हमलों से मुक्त नहीं है और हर एक को उससे निपटने के लिए साधारण और स्पेसिफिक नियमों का पालन करना ही पड़ता है। आज यह आम चलन हो गया है कि किसी नेता का ब्लॉग, वेबसाइट या फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया अकाउंट कोई थर्ड पार्टी मैनेज करती है। यह कोई फ्रीलांसर या कंपनी हो सकती है। कांग्रेस या भाजपा या फिर हैकिंग के शिकार दूसरे लोगों को यह समझना चाहिए कि जितने अधिक लोगों को संवेदनशील जानकारियां, पासवर्ड पता होंगे, उसके लीक होने के चांसेज भी उतने ही बढ़ जायेंगे।
कई डिजिटल एजेंसियां इस मामले में अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं और उनको भी पासवर्ड देने से परहेज करती हैं, जिनका वह कार्य करती हैं।
वेबसाइट के मामलों में सर्वर पर फ़ायरवॉल एक बेहतर विकल्प होता है। cloudflare.com  जैसी कंपनियां इस मामले में बढिय़ा सलूशन देती हैं और अगर आपकी वेबसाइट संवेदनशील है तो सिक्योरिटी के मामले में आपको समझौता नहीं करना चाहिए।

अधिकांश वेबसाइट और ऑनलाइन माध्यम आपको टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन की सहूलियत भी देते हैं। यह OTP की तरह होता है और आपको अवश्य ही इसका इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे सुरक्षा परतें और भी मजबूत हो जाती हैं। ध्यान रहे, हैकर्स आज के समय में बेहद स्मार्ट टेक्निक्स अपनाते हैं, मसलन 'ब्लैक हैट हैकर या क्रैकर' जैसे खतरनाक हैकर जो अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वर्षों तक किसी कम्प्यूटर की निगरानी करते रहते हैं। सामान्यत: यह उद्देश्यपरक हैकिंग होती है और बहुत संभव है कि राहुल गाँधी या कांग्रेस का अकाउंट इस तरह के हैकर्स का ही कार्य हो। इसी तरह, व्हाइट हैट हैकर्स (जिज्ञासावश किसी कम्प्यूटर की छानबीन करने वाला), हैक्टिविज़्म (किसी सामाजिक या राजनीतिक प्रकार के संदेश को नेट के जरिए प्रचारित करने के लिए हैकिंग का सहारा लेने वाला), पोर्ट रीडायरेक्शन (फायरवॉल या प्रॉक्सी सर्वर द्वारा एक आईपी एड्रेस या पोर्ट से दूसरे की ओर नेट यातायात का रुख मोडऩे की क्रिया), एक्स्प्लॉइट (ऑपरेटिंग सिस्टम या एप्लिकेशन में कोई ऐसी खामी, जिसे हैकर पकड़ लें), ट्रॉजन हॉर्स (कोई निषिद्ध या अनधिकृत कार्य करने वाला सॉफ्टवेयर, जो ऊपर से देखने में बढिय़ा प्रतीत होता है), रैन्जमवेयर (फाइल कैप्चरिंग और वसूली) जैसी तमाम शब्दावलियाँ प्रचलन में हैं, किन्तु सभी का उद्देश्य यही रहता है कि कैसे कमियों का फायदा उठाकर आपके सिस्टम या वेबसाइट, सोशल मीडिया अकाउंट में घुसा जाए। एंटी-वायरस या ऑपरेटिंग सिस्टम कंपनियां अपने स्तर पर जो करती हैं सो करती ही हैं, किन्तु हैकिंग से बचने के लिए ऊपर बताये गए तमाम सावधानियों को आप द्वारा अवश्य ही आजमाया जाना चाहिए, अन्यथा आप मानसिक, आर्थिक नुक्सान उठा सकते हैं, इस बात में दो राय नहीं!