27 मार्च 2017

हमारी जीवनदायनी


 हमारी जीवनदायनी

 जिस तरह आज 21 वी सदी के पूर्वाध में कुछ प्रबुद्ध भारतीय 3 तलाक का विरोध कर रहे है, उसी तरह 19 वीं सदी के पूर्वार्ध में राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया था ,समाज में व्याप्त कुरीतियाँ ; अमानवीय सोच की पराकाष्ठा है /
ये सामजिक कुरीतियाँ किसी एक विशेष संप्रदाय में ही नही वरन ये व्यापक रूप से हमारे आपके अन्दर पैठ बना चुकी है,
हम सब को अहसास ही नहीं होता की हमारी मानसिकता किसी दुसरे व्यक्ति के लिए कैसी निकृष्ट होती जा रही है, अहसास हो भी तो कैसे जबकि हमें ये बताया ही नहीं गया हो की मर्यादित स्थिति क्या है ; अहसास तो तब होता है जब खुद पर गुजरती है, हमारे खुद के समाज में इसे तमाम उदहारण पटे पड़े है आप एक बार आँखे खोल के देखिये समझ आ जायेगा, हम दिन बा दिन अमानवीयता के नए नये परचम लहरा रहे है, किसी को फुर्सत नही होती की एक एक्सिडेंटल आदमी को हॉस्पिटल पहुच दे/
तो ये बता रहा था की  ये सामजिक कुरीतियाँ किसी एक विशेष संप्रदाय में ही नही वरन ये व्यापक रूप से हमारे आपके अन्दर बैठी हुई है, हमको हमेशा ही किसी ऐसे व्यक्ति की जरुरत होती है जो हमको इन कुरीतियों के बारे में बता सके , जिस तरह आज कुछ मंद अक्ल लोग तीन तलाक के समर्थन में है उसी तरह कमोबेश 200 साल पहले भी कुछ मंद अक्ल धार्मिक ठेकेदारों ने सती प्रथा को ख़तम करने का विरोध किया था, 2शताब्दी पहले यह सुधार बैंटिक के हाथो में था आज यह सुधार मुख्यतः माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हाथों में है/
प्रगति के सिद्धांतो के अनुसार ‘सभी समाज को समय के अनुसार अवश्य बदलना होता है, कोई भी समाज न जड़ था; न जड़ हो सकता है’  किसी भी स्थिति में आदमी को तब पवित्र ग्रंथों शास्त्रों और विरासत में मिली परम्पराओं से हट जाने में नहीं हिचकिचाना चाहिए जब मानवीय तर्क शक्ति का वैसा तकाजा हो और वो परम्परायें समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही हों,
नए और पुराने दृष्टिकोण में टकराव होना कोई नयी बात नहीं है , और टकराव होना भी चाहिए क्योकि समाज को तो वही चाहिए जो समाज के हित में हो लेकिन वो टकराव केवल मतभेद के रूप में होने चाहिए, खुले मन और संकुचित विचारधारा का टकराव होगा तो परिणाम या तो नगण्य होगा या तो विध्वंशक और हमे दोनों ही नहीं चाहिए, हमे जरुरत नहीं है न्यूज़ चैनल पर आके चिल्लाने वालो की हमें राज्यसभा टीवी के जैसे बौद्धिक डिबेट करने वालों की जरुरत है,
इतिहास में जब भी कभी समाज में मानवता को नष्ट करने वाली कुरीतियों के निदान की शुरुवात हुई है इन्ही कुरीतियों को बचने वाले भी खड़े हुए है जिसकी वजह शायद यह है की इन्हें महसूस ही नहीं होता की ये बुराईयाँ है, उदहारण के तौर पर कोई बाहरी व्यक्ति ही आपको बता सकता है की आपके घर के पास के नाले में अजीब दुर्गन्ध है वो दुर्गन्ध आपको इसलिए महसूस नहीं हो रही क्युकी आपका दिमाग उस दुर्गन्ध को आत्मसात कर चुका है/ सामाजिक बुराई हटने के बाद विरोधी भी महसूस करते है की हमने किस रोग को पाला हुआ था/
आज अगर नयी पीढ़ी की किसी व्यक्ति को सती प्रथा के बारे में बताओ तो निश्चय ही वो आश्चर्य व्यक्त करेगा,
और जहा तक पवित्र ग्रंथो की बात है न तो किसी स्त्री को जबरन सती करने का प्रावधान कही पर था और न ही तीन तलाक का ऐसा मौजूदा स्वरुप ,

बात यहाँ पर किसी धर्म विशेष की नहीं; एक जीती जागती औरत की है  जो किसी धर्म में होने के पहले एक जिन्दा मनुष्य है ,एक जीवनदायनी है उसे न तो जबरन जिन्दा जला देना सही था और न ही एकतरफा तलाक़ दे कर 3 महीने में उसे बेसहारा छोड़ देना सही है,

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