16 जनवरी 2017

ठंडे बस्ते में जांच कमेटियां

कानपुर रेल हादसे ने एक बार फिर सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है। लोग मरते रहें, हादसे होते रहें, इससे सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार को पता है कि ऐसे हादसों के बाद एक जांच कमेटी गठित करनी है। जिसकी रिपोर्ट भी उनके ही पाले में रहेगी। येही होता है रेलवे सुरक्षा के नाम पर बनाई गई हर कमेटी का अंजाम।

साल 2011 में रेलवे सुरक्षा उपायों पर तत्कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने डॉ. अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई थी। वर्ष 2013 में कमेटी की सौंपी गयी रिपोर्ट में रेलवे सेफ्टी अथॉरिटी का गठन, रेलवे रिसर्च एंड डेवलपमेंट काउंसिल बनाने का सुझाव दिया गया था। इसके अलावा स्टेशन मास्टर, असिस्टेंट स्टेशन मास्टर, असिस्टेंट लोको पायलट, गैंगमैन, कीमैन, प्वाइंटस मैन जैसे सुरक्षा स्टॉफ की कमी दूर करने समेत 106 अहम सुझाव दिए थे।
काकोदकर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ट्रैक और रोलिंग स्टॉक का रखरखाव बढ़ाने, कलपुजरे की कमी दूर करने और प्रशासनिक ढांचे में सुधार के लिये 5 सालों में 1.40 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत बताई थी। काकोदकर कमेटी से पहले भी कई कमेटियां बनी हैं। लेकिन उनके सुझावों पर भी अमल नहीं हुआ। 1962 में गठित कुंजरू कमेटी, 1968 में बांचू समिति, 1978 में सीकरी समिति, 1998 में खन्ना समिति ने भी रेल में सुधार और यात्रियों की सुरक्षा के ठोस उपाए सुझाए थे।
सभी कमेटियों ने दुर्घटना की मुख्य वजह शॉर्ट सर्किट, असुरक्षित क्रॉसिंग, ट्रेन का पटरी से उतरना, रेलवे स्टाफ की कमी, सामान में खामियां, टक्कर को माना था लेकिन तमाम सुझाव ठंडे बस्ते में डाल दिए गए।
अब कानपुर रेल हादसे के बाद सवाल फिर से वही खड़ा हो रहा है कि आखिर इन कमेटियों का क्या फायदा। क्यों बनाई जाती हैं इस तरह की कमेटियां? एक सवाल और कि आखिर सरकारें इन हादसों से कब सबक लेंगी?

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