शायद आपने भी ग़ौर किया होगा कि दो-तीन दिन से इंटरनेट धोखा
दे रहा है. या तो कनेक्शन नहीं मिलता, या फिर उसकी रफ़्तार बेहद धीमी है.
नोटबंदी के इस दौर में डिजिटल लेन-देन की ज़रूरत है और लंबी
क़तारों से बचने के लिए इंटरनेट बड़ा सहारा साबित हो सकता है. ऐसे में चेन्नई के
वरदा तूफ़ान ने देश के कई हिस्सों में ये सहारा छीन लिया है.
एयरटेल और वोडाफ़ोन जैसी मोबाइल नेटवर्क कंपनियों ने मैसेज
के ज़रिए अपने ग्राहकों को बताया कि तूफ़ान ने अंडरसी (समुद्र में) केबल को नुकसान
पहुंचाया है, जिसके
चलते कनेक्शन में दिक्कतें पेश आ सकती हैं.
सवाल उठना लाज़मी है कि इस तूफ़ान और हमारे इंटरनेट का क्या
लेना-देना? दरअसल, इंटरनेट की दुनिया समंदर ने नीचे
बिछी केबल से चलती है और अगर ये केबल प्रभावित होती हैं, तो इंटरनेट कनेक्शन में परेशानी
आनी तय है.
टेलीकम्युनिकेशन मार्केट रिसर्च फ़र्म टेलीज्यॉग्रफ़ी के
मुताबिक दुनिया भर में समंदर के नीचे फ़िलहाल 321 केबल सिस्टम काम कर डिजिटल इंडिया को तूफ़ान, शार्क और
जहाज़ों से है ख़तरारहे हैं. इनमें कुछ निर्माणाधीन
हैं और इनकी संख्या साल दर साल बढ़ रही है.
आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि साल 2006 में जहां सबमरीन केबल के हिस्से
सिर्फ़ एक फ़ीसदी ट्रैफ़िक था, वहीं
अब 99 फ़ीसदी अंतरराष्ट्रीय डाटा इन्हीं
तारों से दौड़ता है.
केबल तारों को किन चीज़ों से ख़तरा?
इन केबल का इतिहास पुराना है. 1850 के दशक में बिछाई गई पहली सबमरीन
कम्युनिकेशन केबल टेलीग्राफ़िक ट्रैफ़िक के लिए इस्तेमाल होती थी जबकि आधुनिक केबल, डिजिटल डाटा के लिए ऑप्टिकल
फ़ाइबर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती है. इनमें टेलीफ़ोन, इंटरनेट और प्राइवेट डाटा
ट्रैफ़िक शामिल है.
आधुनिक केबल की बात करें, तो इनकी मोटाई क़रीब 25 मिलीमीटर और वज़न 1.4 किलोग्राम प्रति मीटर होता है. किनारे पर छिछले पानी के लिए
ज़्यादा मोटाई वाली केबल इस्तेमाल होती है. अंटार्कटिका को छोड़कर सारे महाद्वीप
इन केबल से जुड़े हैं.
लंबाई की बात करें, तो ये लाखों किलोमीटर में है और इनकी गहराई कई मीटर है.
दुनिया कम्युनिकेशन, ख़ास
तौर से इंटरनेट के मामले में इन केबल पर निर्भर करती है और इन तारों को नुकसान
पहुंचने के कई कारण हो सकते हैं.
जापान ने पेश की थी मिसाल
चेन्नई के तूफ़ान जैसे कुदरती हादसे तो अपनी जगह हैं, लेकिन अतीत में शार्क मछलियों से
लेकर समुद्र में निर्माण संबंधी उपकरण और जहाज़ों के लंगर भी इन तारों के लिए
ख़तरा पैदा कर चुके हैं.
इन ख़तरों के बावजूद सबमरीन केबल, सैटेलाइट इस्तेमाल करने की तुलना
में कहीं ज़्यादा सस्ती हैं. ये सही है कि सैटेलाइट के ज़रिए दूर-दराज़ के इलाकों
तक पहुंचा जा सकता है, लेकिन
दुनिया भर के देश अब नए फ़ाइबर-ऑप्टिक केबल बिछाने में निवेश कर रहे हैं.
मौजूदा केबल नेटवर्क को मज़बूत बनाने के लिए बैकअप के लिए
केबल भी बिछाई जा रही हैं. साल 2011 में
जापान में आई सुनामी ने केबल तारों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया था, लेकिन मज़बूत बैकअप के बूते वो
ऑनलाइन रहने में कामयाब रहा.
चेन्नई और मुंबई बेहद अहम
अब बात करें भारत की. सबमरीन केबल
नेटवर्क के मुताबिक़ देश में 10 सबमरीन केबल लैंडिंग स्टेशन हैं, जिनमें से चार मुंबई, तीन चेन्नई, एक कोच्चि, एक तुतीकोरिन और एक दिघा में है.
इनमें अगर भारत के दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट गेटवे
की बात करें, तो इस
लिहाज़ से मुंबई और चेन्नई काफ़ी अहम हैं. और चेन्नई के तूफ़ान ने समंदर में
ऑप्टिक फ़ाइबर को नुकसान पहुंचाकर साउदर्न इंडियन गेटवे को प्रभावित किया है.
कई अहम तारों से जुड़ी चेन्नई
चेन्नई बे ऑफ़ बंगाल गेटवे (8,100 किलोमीटर), सीमीवी-4 (20 हज़ार
किलोमीटर), टाटा
टीजीएन-टाटा इंडिकॉम (3175 किलोमीटर)
और आई2आई केबल नेटवर्क (3200 किलोमीटर) जैसे केबल नेटवर्क से
जुड़ा है. ये नेटवर्क उसे यूरोप और दक्षिण एशिया से जोड़ते हैं.
इसके अलावा मुंबई को जोड़ने वाले अहम केबल नेटवर्क का नाम
है यूरोपा इंडिया गेटवे, जिसकी
लंबाई क़रीब 15 हज़ार
किलोमीटर है.
मोबाइल नेटवर्क कंपनियों के मुताबिक उनके इंजीनियर केबल में
आई ख़ामियों को दूर करने की कोशिश में जुटे हैं और जल्द ही इस समस्या को दूर कर दिया
जाएगा.
लेकिन जब तक वरदा की चपेट में आई केबल ठीक नहीं होतीं, आपका इंटरनेट हौले-हौले ही चलेगा. साभार -बीबीसी
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