अभी तो यह भविष्य के गर्भ में है की काला धन ख़त्म करने की योजना कारगर हुई या नही, किन्तु अभी यह योजना “पूरा
देखिये जात, आधा लीजिए बाँट” को चरितार्थ कर रही है और digidhan की तरफ मुड चुकी है |इससे पहले भी कई बार काला-धन
उजागर करने की योजनायें आई किन्तु सभी संभावना से कम ही सफल हुई है इसका कारण था भय
बिनु होई न प्रीति, किन्तु अभी तो भय भरपूर है, नोट बंदी का भय, लाईनों में लगने का भय बैंकिंग अधिकारीयों के प्रश्नों का भय | परन्तु राजनितिक पार्टियों को नोट
बदलने की खुली छूट देने की गलती(भले ही वह विधिमान्य हो) असहनीय है क्योंकि खुद प्रधानमंत्री के द्वारा लोगों
को यह विश्वास दिला दिया गया था की नोट बंदी से राजनितिक-कालाधन भी बाहर आएगा | क्योंकि सभी को पता है की राजनितिक-कालाधन,
अभी तक प्राप्त कालेधन से कई गुना ज्यादा है | यदि सरकार की इच्छाशक्ति हो तो एक अध्यादेश
राजनितिक पार्टियों पर भी लाया जा सकता है(जो की शायद असम्भव ही है) | और तो और कालाधन को
सफ़ेद करनें में बैंकिंग अधिकारियों की संलिप्तता भी इन योजनाओं के नाकामी का प्रमुख
कारण होगी|
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